हमारे ग्रंथ पुराणों आदि में वास्तु एवं ज्योतिष से संबंधित गूढ़ रहस्यों तथा उसके सदुपयोग सम्बंधी ज्ञान का अथाह समुद्र व्याप्त है जिसके सिद्धान्तों पर चलकर मनुष्य अपने जीवन को सुखी, समृद्ध, शक्तिशाली और निरोगी बना सकता है। प्रभु की भक्ति में लीन रहते हुए उसके बताये मार्ग पर चलकर वास्तुसम्मत निर्माण में रहकर और वास्तुविषयक जरूरी बातों को जीवन में अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को सुखी व सम्पन्न बना सकता है। सुखी परिवार अभियान में वास्तु एक स्वतंत्र इकाई के रूप में गठित की गयी है और उस पर गहन अनुसंधान जारी है। असल में वास्तु से वस्तु विशेष की क्या स्थित होनी चाहिए। उसका विवरण प्राप्त होता है। श्रेष्ठ वातावरण और श्रेष्ठ परिणाम के लिए श्रेष्ठ वास्तु के अनुसार जीवनशैली और ग्रह का निर्माण अतिआवश्यक है। इस विद्या में विविधताओं के बावजूद वास्तु सम्यक उस भवन को बना सकते हैं। जिसमें कि कोई व्यक्ति पहले से निवास करता चला आ रहा है। वास्तु ज्ञान वस्तुतः भूमि व दिशाओं का ज्ञान है।

वास्तु शास्त्र के प्रति रूचि :-

लगभग पिछले 20-25 सालों से अपने यहाँ के सुशिक्षित लोगों को प्राचिन भारत के वास्तुशास्त्र के प्रति रूचि पैदा हो चुकी है। सैंकडों सालों से इतिहास बना हुआ यह शास्त्र 80 वें दशक में अपना अस्तित्व फिर से जताने लगा है। वास्तुशास्त्र जब पर्दे के पीछे था तब भी बिल्डींगे बनाते समय इस देश में वास्तुशास्त्र का आधार लिया जाता छा। अब तो वास्तुशास्त्र बहुत लोकप्रिय हो चुका है। जो कोई इस शास्त्र के अनुसार वास्तु का निर्माण करता है, और इस शास्त्र के अनुसार बनी हुई वास्तु में रहता है उसे यश, आरोग्य, सुख, समृध्दि सबकुछ निश्चित प्राप्त होता है ऐसा प्रचार किया जा रहा है। यह शास्त्र पूरी तरह से विज्ञाननिष्ठ है सा इस शास्त्र का दावा है जिने हमें जाँचकर देखना। विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोन का एक महत्वपूर्ण तत्व है। सही ज्ञान हमें ज्ञानेंद्रिय के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसी तत्व के अनुसार धीरे-धीरे वैज्ञानिक पध्दति निरीक्षण, अन्वेषण, प्रयोग अनुमान – निष्कर्ष जैसी सीढ़ीयों को पार करके सिध्द हो सकती है। ज्ञानप्राप्ती की यह सर्वाधिक विश्वसनीय पध्दति है।

आधुनिक जगत मे किसी को भी विज्ञान, उससे प्राप्त सुखसुविधाएँ, उसकी विश्वसनीयता को नकारना असंभव है। वैज्ञानिक होना बहुत सम्मान और प्रतिष्ठा दैनेवाली बात है। अत: कुछ भी करके वास्तुशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल पर सही साबित करने की कोशिश जारी रहती है। यह शास्त्र विज्ञाननिष्ठ नहीं है इतना कह देना पर्याप्त नहीं। कौनसी परिस्थिति में इसका निर्माण हुआ, उसकी वृध्दि कैसै हुई, उस वक्त का समाज, लोगों के व्यवहार, खान-पान आदि सारी बातों की चर्चा होनी चाहिए। मकान की जरुरत तोउसे शुरु से ही रही है। आदमी को ही नहीं, पंछी, जानवर, कीटक, चींटी सभी सजीवों को रहने के लिए स्थान लगताही है। अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार हर कोई मकान ढूँढता है या स्वयं उसका निर्माण करता है। यह सबकुछ अन्य प्राणी अपनी आवश्यकता के अनुसार सैंकडों सालों से अपना मकान बनाते आये हैं। मनुष्यने अपनी बुध्दि का इस्तेमाल करके अपना मकान बनाने की कला में अपनी जरुरतों के अनुसार समय समय पर सुधार किये हैं।

प्रांरभ से ही मकान बनाते वक्त सुधार क्ये जाने लगे मकान बनाने का वास्तुशास्त्र केवलमात्र भारत में ही बनाया गया ऐसी बात नहीं। इस प्रकार का शास्त्र बनाना और स्थल-काल, भौगोलिक परिस्थिति, उस इलाके की हवा, वहाँ की संस्कृति, वहाँ पैदा होनोवाली मुसीबतें आदी के कारण महसूस होनेवाली अलग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार मकान बनाने में निरंतर सुधार होते रहे। संसार भर में यह सब चलते ही रहता है। यहाँपर ध्यान में रखने जैसी बात यह है कि आर्य लोगों की टोलियों ने आक्रमण करके वहाँ की संस्कृति को समाप्त करने के बाद भारतीय वास्तुशास्त्र वास्तुशास्त्र का निर्माण किया। वहाँ की संधोक संस्कृति की भाँति अन्य अनेक प्रगतीशील संस्कृतियों का ऐसी टोलियों ने विध्वंस किया है। ऐसे आक्रमणों से कुछ इनी-गिनी संस्कृतियों ने स्वयं को बचाया है।

एतिहासिक पहलु : -

इस शास्त्र को विज्ञान कहें या नहीं इस बात को तय करने से पहले यह जब निर्माण हुआ उस काल की घटनाएँ और उसके परिणामों की जाँच करनी होगी। वास्तुशास्त्र के प्रवक्ता लोग कहते हैं कि इस शास्त्र का जनम वैदिक काल में हुआ है। ऋगवेद में इसके बारे में कुछ सबूत भी मिलते हैं। आर्य लोग भारत में आने से पहले सिंधू नदी के आसपास मूल रहिवासी बढ़िया ढंग से मकान बनाते थे। इन लोगों पर कब्जा करके अपनी सत्ता स्थापित करने हेतु आर्य लोगों को कई पापड बेलने पडे थे। वास्तुशास्त्र उन्हीं कोशिशों में से एक है। इसका मूल है यज्ञवेदी के निर्माण में यज्ञीय परंपरा और यज्ञीय विधि ज्यों ज्यों विस्तृत होते गये त्यों त्यों चातुवर्ण पध्दति मजबूत बनती गयी और मकान बंधने के कार्य को करते समय गूढ शक्तियों को शांत करना, तृप्त करना और इसके लिए कर्मकान्ड करना शूरु हुआ। ये महाशक्तियाँ गण, गुरु, स्थपति, पुरुष आदि नामों से पहचानी जाती हैं। इसमें वास्तुपुरुष मंडल और वास्तोस्पती इन कल्पनाओं का सृजन हुआ। शुभ-अशुभ, पितर, वास्तुशास्त्र, ब्रम्ह, ईश्वर, स्वर्ग, मोक्ष, आत्मा जैसी कल्पनाओं का निर्माण इसीमें से हुआ। आर्य लोग आने से पहले सिंधू नदी के इर्दगिर्द बहुत बारीकी से नियोजन करके कुछ महानगर बस गये थे। खोदकाम के बाद इन बातों का पता चला है। वास्तुशास्त्र की वजह से चार वर्णोवली समाज रचना को बनाया गया। आजकाल जो वर्ण और जाति की व्यवस्था को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि यह दुष्ट व्यवस्था इतनी टिककर रहने के पीछे वास्तुशास्त्र का बहुत बड़ा हाथ है। निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है।